You are here: Home

गुजरात में इठलाठी बलखाती राष्ट्रभाषा हिंदी Featured

Written by  Published in Opinion Monday, 12 March 2018 11:26
 जिस गुजरात से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1917 में भरूच में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता प्रदान की और गुजराती के महान कवि श्री नर्मद ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा तथा वर्तमान समय में अपने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हिंदी में भाषण देकर खूब सूर्खियां बटोरीं। आज उसी गुजरात में राष्ट्रभाषा हिंदी को अपमानित किया जा रहा है। जिस हिंदी भाषा की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं आज उनके ही गृह राज्य गुजरात में हिंदी राष्ट्रभाषा का कोई महत्व नहीं है। वर्तमान समय में उनके राज्य गुजरात में ही शासन-प्रशासन से लेकर सरकारी अधिकारी तक हिंदी भाषा की इस तरह उपेक्षा करते हैं कि जैसे हिंदी भाषा कोई राजभाषा न होकर विदेशी भाषा हो। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा 1917 में गुजरात के भरूच में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता प्रदान की गई थी। तत्पश्चात 14 सितंबर 1947 को संविधान सभा द्वारा एकमत से हिंदी को राजभाषा का दर्जा का निर्णय लिया गया, तथा 1950 में संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के द्वारा हिंदी को देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा दिया गया। राजभाषा अधिनियम 1963 द्वारा राजभाषा के शासकीय कार्यों नियमन हेतु प्रावधान किए गए। तीन भाषाई क्षेत्र बनाए गए जिसके तहत "क" क्षेत्र में उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, हरियाणा, हिमाचल, उत्तरांचल, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली एवं अंडमान द्वीप समूह। "ख" क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र तथा "ग" क्षेत्र में उपरोक्त के अतिरिक्त सभी राज्य एवं संघ क्षेत्र रखे गए। इन सभी राज्यों के लिए हिंदी का राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भी गठित की गई है। परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती यह है कि आज भी गुजरात में  राजभाषा व राष्ट्रभाषा हिंदी को पूर्ण रूप से क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है। 

  जबकि भारत के संविधान में अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी संघ की राजभाषा है। वैसे देखा जाए तो हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने को लेकर सतत आंदोलन चलाया जा रहा है । यहां तक कि आजादी के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के लाख चाहने के बावजूद हिंदी को संविधान द्वारा स्वीकृत राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया, हांलाकि 14 सितंबर 1949 को संविधान में अनुच्छेद 343 जोड़कर हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित कर राष्ट्रभाषा के नाम पर देशवासियों को बरगला दिया गया। अब देश भर में 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में हर जगह कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे । मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से एक दूसरे को खूब बधाई एवं शुभकामनाएं दी जाने लगी । स्कूल, कॉलेज एवं सरकारी कार्यालयों में हिन्दी को लेकर कई कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। हिन्दी के प्रति लोगों का यह प्रेम देखकर बहुत अच्छा लगता है, परन्तु एक बात समझ में नहीं आती कि पूरे भारत में चाहे कोई भी विभाग हो प्रत्येक कुर्सी पर हमारा अपना ही कोई बैठा हुआ है। एक भी कुर्सी पर कोई विदेशी नहीं बैठा है। तब फिर हिन्दी को लेकर राजभाषा और राष्ट्रभाषा तथा देशभाषा के मामले पर हम इतना सोचते क्यों हैं ? आज यदि केन्द्र और राज्य सरकारों में बैठे मात्र हिंदी भाषी कर्मचारी और अधिकारी ही अपनी सेवा के समय हिंदी में ही काम करें, तो 'राजभाषा व राष्ट्रभाषा का संघर्ष पचहत्तर फीसदी समाप्त हो जायेगा। लेकिन हिंदी को लेकर प्रेम-पाखंड-ईर्ष्या - घृणा आदि सब है। वैसे तो हर राज्य में हिंदी का राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा पूर्ण समर्पण से प्रसार किया जा रहा है, परंतु गुजरात राज्य में हिंदी का राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा हिंदी भाषा को लेकर कोई सक्रियता दिखा रही है ऐसा नहीं लगता। यही कारण है कि गुजरात राज्य में हिंदी भाषा को लेकर भेदभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता है।

    हिंदी के विषय में लगता है संविधान के संकल्पों का निष्कर्ष कहीं खो गया है। संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की शक्ति, क्षमता और सामर्थ्य अकाट्य, अदम्य और अद्वितीय है। किंतु सहज ही मन में प्रश्न उठता है कि हमने संविधान के सपने को साकार करने के लिए क्या किया ? क्यों नहीं हमारे कार्यक्रम प्रभावी हुए ? क्यों और कैसे अंग्रेजी भाषा की मानसिकता हम पर और हमारी युवा पीढ़ी पर हावी हो चुकी है कि हमारी अपनी भाषाओं की अस्मिता और भविष्य संकट में है। शिक्षा में व्यापार और व्यवहार में संसदीय, शासकीय और न्यायिक प्रक्रियाओं में हिंदी को और प्रादेशिक भाषाओं को पांव रखने की जगह तो मिली, संख्या का आभास भी मिला, किन्तु प्रभावी वर्चस्व नहीं मिल पाया। वोट मांगने के लिए जनसाधारण तक पहुंचने के लिए आज भी हिंदी व भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। किंतु हमारे अधिकारी वर्ग और हमारे नीति निर्माताओं के चिंतन में अभी भी राजभाषा हिंदी के लिए कोई स्थान नहीं है। वलसाड जिला से अनगिनत गुजराती भाषा में अखबार निकलते हैं, जिनमें हिंदी अखबारों की संख्या बहुत कम है। इसका एक ही कारण है कि यहां का शासन-प्रशासन हिंदी अखबारों को कोई महत्व नहीं देते हैं । यहां तक कि सूचना विभाग भी सिर्फ गुजराती भाषा में ही प्रेस रिलीज कर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर देते  हैं। जबकि देखा जाये तो वलसाड जिले में एक बहुत बड़ी जनसंख्या में हिंदी भाषी लोग रहते हैं। इन्हें भी शासन-प्रशासन द्वारा किए जाने वाले कार्यों व गतिविधियों के बारे में जानकारी रखना आवश्यक है। और संविधान के तहत उनका हक भी बनता है कि उन्हें उसी भाषा में जानकारी उपलब्ध कराई जाये, जिस भाषा में वे अच्छी तरह से समझ सकें। परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती यह है कि वलसाड जिला में शासन-प्रशासन व राजनीतिक दलों द्वारा हिंदी व हिंदी अखबारों के प्रति सौतेला पूर्ण रवैया अपनाना एक तरह से राजभाषा व राष्ट्रभाषा हिंदी का अपमान ही है। 

   आश्चर्य यह है कि यहां जाति-धर्म को लेकर विवाद हो सकता है, पानी को लेकर आग लग सकती है। अपने देश में चाहे कोई भी घटना हो उस पर राजनीति हो सकती है। जबकि आज भी आधी जनसंख्या गरीबी का सामना करने को मजबूर है।  ऐसे हमारे लोग हैं और ऐसी हमारी राजनीति। खैर जाति-धर्म और बंटवारे को लेकर राजनीति तो आजादी के बाद से ही जारी है। अब पानी पर आग लगी है। अब यह आग कब बुझेगी पता नहीं ? जबकि मंहगाई ऐसी है कि आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है, उस पर भी भ्रष्टाचार। अपनी जेब में माल है न, बस ताल से ताल मिला है। मंहगाई और भ्रष्टाचार से मुक्ति कौन दिलायेगा ? भूल जाइए, ये हैं इसलिए क्योंकि हमारे नेता इन्हें बनाए, बढ़ाए रखना चाहते हैं। ताकि जनता का शोषण जारी रहे और उन्हें राजनैतिक इस्तेमाल के लिए तैयार करने में कठिनाई न हो। जहां तक राष्ट्रभाषा का प्रश्न है, भारत की राष्ट्रभाषा कल भी हिंदी थी, आज भी हिंदी है और आने वाले कल भी वही रहेगी। हिन्दी को सत्ता की न कोई भूख है न प्यास। उसका संघर्ष प्रतिष्ठा और सम्मान का है। वह एक हृदयग्राही भाषा है। हिन्दी दासी भाषा तो है ही नहीं। खीजने, चिल्लाने से या किसी को कोसने से हम हिन्दी के निश्चल चरित्र को कोई नया आयाम नहीं दे पायेंगे। हम खुद पहले हिन्दी के हो जायें। हिन्दी में सोचें , बोले और अवश्य लिखें। हिन्दी के संदर्भ में यह युग और यह शताब्दी चिंता की नहीं है। आत्ममंथन और पूर्ण समर्पण का युग है। आपके हमारे बच्चे आज जिस परिवेश में पल रहे हैं उसमें कहीं हिन्दी है या नहीं इस पर नजर रखिए। जिस भ्रम को आप पाल रहे हैं उसमें कहीं ऐसा तो नहीं कि आप और हम अंतर्राष्ट्रीय बनने की जुगाड़ में राष्ट्रीय भी नहीं रहे। 

Submit to DeliciousSubmit to DiggSubmit to FacebookSubmit to Google PlusSubmit to StumbleuponSubmit to TechnoratiSubmit to TwitterSubmit to LinkedIn
Read 1372 times

Login to post comments

फोटो गैलरी

Contact Us

    • Address: INDIA HIGHLIGHT, KRISHNA NEWS NETWORKS,
    • AT & POST: SANJAN-396150
    • SURATINDIA HIGHLIGHT, KRISHNA NEWS NETWORKS,
    • 84-ARIHANT PARK, CHAPPRA BHATHA ROAD, AMROLI, SURAT
    • Mob: +91.9228407101 Email: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.  Website: http://indiahighlight.org/

3d Printer

About Us

India Highlight is one of the renowned media group in print and web media. It has earned appreciation from various eminent media personalities and readers. ‘India highlight’ is founded by Mr. Pinal Patel.