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Mehman Ka Panna (38)

 
 
श्यामजी मिश्रा :
  कश्मीर में हुए 44 जवानों के बलिदान ने देश का दिल दहला दिया है। लोग चाहते हैं कि इस खून का बदला खून से लिया जाए। इतना ही नहीं, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ दिया जाए लेकिन इस दुर्घटना को लगभग कई दिनों से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन हमारी सरकार के प्रवक्ता सिर्फ बातों के गोले उछाल रहे हैं, बैठकें कर रहे हैं और उनकी पूर्व-निश्चित नौटंकियां भी जारी हैं। उनमें कोई फर्क नहीं पड़ा। आत्म-सम्मोहन का यह दृश्य देखकर मुझे पं. जवाहरलाल नेहरु का वह कथन याद आ रहा है, जो उन्होंने चीनी घुसपैठ और हमले के वक्त दिया था। उन्होंने श्रीलंका जाते समय अपनी फौज को आदेश दे दिया था कि वह चीनी फौज को खदेड़ दे। 1962 में फिर क्या हुआ, यह मुझे आपको बताने की जरुरत नहीं है। जबसे पुलवामा अटैक हुआ है तब से लगभग वही मुद्रा  सभी टीवी चैनलों और हमारे अखबारों में हमें हमारे प्रधानमंत्रीजी की देखने को मिल रही है। जवानों, तुम्हारा बलिदान बेकार नहीं जाएगा, यह भी कोई कहने का तरीका है ? यदि सरकार यह मानती है कि यह अपराध पाकिस्तान की जैश-ए-मुहम्मद ने किया है तो वह इतने दिनों तक जबानी जमा-खर्च क्यों करती रही ? जिस दिन यह घटना हुई उसी दिन सूर्योदय के पहले ही उसको सबक सिखा देना चाहिए था। अगर मैं मोदी जी की जगह होता तो इमरान खान को फोन करता और कहता कि आतंकवादियों के शिविरों के पते मैं आपको देता हूं। या तो आप उन्हें सूर्योदय के पहले उड़ा दीजिए। यदि नहीं तो उन्हें हम उड़ा देंगे। यदि अमेरिका उसामा बिन लादेन को खत्म कर सकता है तो भारत मसूद अजहर को क्यों नहीं कर सकता है । लेकिन भारत को अब सख्त कदम उठाना चाहिए।और यह काम मोदी जी कर सकते हैं। अब भी हो सकता है। परंतु सामरिक दृष्टि से देखा जाए तो हमारी सरकार का चरित्र लचर-पचर रहा है। इसका प्रमाण ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का भौंडा प्रचार है। यदि वह स्ट्राइक सचमुच ‘सर्जिकल’ थी तो 2016 से अब तक हमारे 300 जवान क्यों मारे गए ? पिछले तीन साल में लगभग 1000 आतंकी घटनाएं कैसे हो गई ? लगभग 100 बार हमारी सीमा का उल्लंघन क्यों हो गया ? हमारी कूटनीति भी लंगड़ा रही है। हम ट्रंप और शी की खुशामद में गलीचों की तरह बिछे हुए है। अमेरिका और चीन से हम क्यों नहीं कहते कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादी गिरोहों को वे आगे बढ़कर खत्म करने या करवाने का जिम्मा क्यों नहीं लेते ? अरे भाई कब तक हमारे देश के सैनिक ऐसे ही कुर्बान होते रहेंगे ? और कब तक उनकी शहादत पर हम गर्व करते रहेंगे ? 
  लेकिन अब नहीं। अब शहादत पर गर्व करना बंद करिए। सवाल करिए। प्लीज़ सवालों की जगह गर्व करना एकदम बन्द करिए। यह गंदा है। जिंदगी में आपने जिस भी स्थिति पर गर्व किया होगा, उसे बार बार लाना चाहते होंगे। आपका लड़का फर्स्ट आया होगा तो आपको उसपर गर्व हुआ होगा, आप चाहते होंगे वो फ़र्स्ट बार बार आए। आपने घर खरीदा होगा तो प्राउड फ़ील किया होगा। आप इसे भी दोहराना चाहते होंगे।यह ऐसे ही काम करता है।  क्या आप इस शहादत वाले गर्व को बार बार दोहरवाना चाहेंगे ? नहीं। क्या आपने ऐसी किसी और स्थिति का सामना कभी और किया है जहाँ 'न चाहते हुए भी गर्व करना पड़े' ? नहीं। इसलिए बन्द करिए ये। यहाँ गर्व नहीं, सवाल होने चाहिए। दूसरी बात ये भी, कि आप ऐसी शहादत पर कैसे गर्व कर सकते हैं जिसमें शहीद होने वाला अपना पराक्रम दिखा ही न पाया हो ? क्या किसी पहलवान को कोई सनकी पीछे से छूरी मार दे तो आप उस पहलवान की पहलवानी का जश्न मनाएँगे ? क्या लॉजिक है ये ? अगर वो सनकी आदमी उस पहलवान से सामने से लड़ा होता तो जीत पाता ? नहीं। क्या अगर ये घोषित युद्ध होता तो वो 10-15 बोक्के हमारे जवानों को मार पाते ? नहीं। यह मुँहचोरी थी, जो गर्व करने से उनकी ही सीनाज़ोरी जैसी दिखेगी। मत करिए ये। यह युद्ध नहीं था। वो लड़कर नहीं हारे। वो आतंकियों (सनकियों) का शिकार हुए हैं। ठीक वैसे जैसे दुनिया के किसी भी कोने में 'अघोषित' आतंकवाद करता है। यहाँ गर्व न करिए। आप शहीदों के घर गर्व लेकर किस मुँह से जा रहे हैं भाई ? क्या कहेंगे कि हमें गर्व है कि आपके पिता शहीद हुए ? हमें गर्व है कि वो अब नहीं लौटेंगे ? हमें गर्व है कि अब वो राखी नहीं बंधवा पाएँगे ? कितना घटिया है ये। बन्द करिए ये। गर्व करना बिल्कुल बन्द करिए। सवाल करिए। सवाल क्या करना है ये बहुत ही सिम्पल है। एक एक मौत को एक एक मौत की तरह देखिए। एक एक परिवार का उजड़ना महसूस करिए। यह कोई चुनाव नहीं जहाँ 'पिछली बार से ज़्यादा सीटें आ गईं हैं तो कोई पार्टी बड़ी हो गई है। पिछली बार से ज़्यादा शहादतें हुईं हैं तो पिछले बार से ज़्यादा बड़ा हमला हुआ ये'. ये भी घटियापना है। कोई एक भी शहादत होती है तो आप उस एक के घर की सोचिए। आपको वो भी भारी लगेगा। बड़ा हमला छोटा हमला वाली हेडलाइन बन्द करिए। प्लीज़।
यह हमला पॉलिटिकल फेलियर है। यह इंटेलीजेंस फेलियर है। यह हमारी ताक़त का फेलियर है। नीतियों का फेलियर है। इन फेल होते अटेंप्ट्स का ज़बाब माँगिए। कस के पूछिए। उलझ जाइए। सरकारों को हाँफ जाने दीजिए। बोलिए कि हमें गर्व नहीं बल्कि दुःख हो रहा है। गर्व और दुःख एकसाथ नहीं हो सकते। गर्व के साथ तो खुशी आती है। यह कैसा गर्व ? इससे बाहर निकलिए। आपका शहादत पर गर्व करना इन नेताओं का पॉलिटिकल शिल्डिंग बन गया है। तत्काल जब आपको उनकी नीतियों पर सवाल पूछकर उनकी हालत ख़राब करनी चाहिए तो आप गर्व कर रहे होते हैं। न करिए ये। उनसे पूछिए कि हमारे किसी जवान की महानता केवल शहीद होने में क्यों है ? बिना युद्ध के वो शहीद आख़िर क्यों हुआ ? किसकी ग़लती से हुआ ये ? कौन है वो ज़िम्मेदार ? कौन कौन फेल हुआ ? 'शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर बरस मेले' सबसे बुरी कविता है। शहीदों की चिंताओं पर मेले नहीँ, जुलूस निकलने चाहिए। हमारे जवानों की जाती जानों के सवालों की बौछारों का शक्तिशाली जुलूस। हमारे उन जवानों ने किसी कायर के हाथों शहीद होना नहीं सोचा था। वो लड़ते लड़ते मर जाने के सपने भले ही देख लेते होंगे। अपने तमाम सिस्टम के फेलियर को, उन जवानों की शहादत पर अपना अनचाहा गर्व लाकर मत थोपिए। एक एक ज़िम्मेदार को कटघरे में ले आइए। प्लीज़ सवाल करिए। गर्व मत करिए। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी व फ्रांस का रक्षा बजट 2-3% होता है और भारत-पाकिस्तान का रक्षा बजट 7-8% होता है। यही कारण है कि उन देशों में शिक्षित व वैज्ञानिक सोच वाले नागरिक पैदा होते है और भारत-पाक में धार्मिक उन्मादयुक्त आतंकी, चरमपंथी पैदा होते है।
भारत का रक्षा बजट लगभग 4 लाख करोड़ रुपये है और हालात देखिये एक स्थानीय धार्मिक उन्मादयुक्त आतंकी उठता है और 42 जवानों की हत्या कर देता और तकरीबन 4 दर्जन जवानों को अस्पताल पहुंचा देता है ! प्रधानमंत्री कड़ी निंदा करता है, गृहमंत्री कड़ी निंदा करता है, तमाम सत्ता पक्ष कड़ी निंदा करता है, विपक्ष निंदा करता है, जनता मातम विशेषज्ञ बनकर तात्कालिक विलाप कर रही है, कवि कविता लिख रहे है, शायर दो-चार शेर लिख रहे है, कुछ युवा वीर रस की कविताओं के छंद बोल रहे है और मीडिया विस्फोटक रूप अख्तियार करके पाकिस्तान के साथ युध्द के लिए उकसा रहा है। शहरी मध्यम वर्ग मरने-मारने की चर्चा कर रहा है लेकिन मर कौन रहा है ? खेत में फांसी पर लटककर किसान मरता है और सीमा पर उसका बेटा मरता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि यह शहादत नहीं हत्या है ! जवानों की शहादत शांतिकाल में नहीं, बैटल फील्ड अर्थात जंग के मैदान में होती है। शांतिकाल में जवानों की हत्या नीच व घटिया स्तर की राजनीति के कारण होती है। इस देश की राजनीतिक जमात अपने ही देश के जवानों व नागरिकों के साथ अघोषित युद्ध लड़ रही है ! बच्चे कुपोषण से काल-कवलित हो रहे है, नागरिक इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे है, किसान आत्महत्या कर रहा है, युवाओं को धार्मिक उन्माद में धकेला जा रहा है, शिक्षा व्यवस्था चौपट हो गई है और राजनेता रक्षा बजट बढ़ाते हुए अपने मोटे कमीशन का इंतजाम कर रहे हैं। उम्दा तकनीक से लैस मिसाइल बनाने वाला व परमाणु बम बनाने वाला देश लड़ाकू विमान नहीं बना सकता क्योंकि नेताओं की कमीशनखोरी खत्म हो जायेगी ! देश की ताकतवर सत्ता सर्जिकल स्ट्राइक को विश्वयुद्ध जीत की तरह ढोल पीटकर बता रही थी और उधर से एक आतंकी हाफिज सईद ने कहा था कि असली सर्जिकल स्ट्राइक हम करेंगे और दुनियां देखेगी और उसने खुलेआम करके दिखा दिया और दुनियां देख रही है। कोई फोटो, वीडियो नहीं मांग रहा है ! सबकुछ सामने है। उरी अटैक व सर्जिकल स्ट्राइक पर फ़िल्म बन ही गई तो पुलवामा अटैक पर भी एक फ़िल्म बना लीजिए साहेब ! क्या यह देश मातम मना सकता है और कुछ नहीं कर सकता है क्या ? यह देश बहुत कुछ कर सकता है, पाकिस्तान को नक्शे से मिटा सकता है। 130 करोड़ नागरिकों की सेना का नेता बेईमान, बे-गैरत हो सकते हैं क्या ? नहीं हो सकते हैं।  अब तो देशद्रोहियों और दुश्मनों को सबक सिखाने का समय है। अब पाकिस्तान की मिट्टी पलीद करने का समय है। अब 44 के बदले 4400 नहीं बल्कि पाकिस्तान को नक्शे से खत्म करने का समय है। जब सरकार के साथ पूरा देश और विपक्ष खड़ा है तो डर किस बात का ? अब तो पाकिस्तान को उसकी औकात बता दो भाई। अब बयानबाजी नहीं, कार्यवाही होनी चाहिए। 
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आज के आधुनिक युग में मानव दिन-प्रतिदिन कार्य एवं जिम्मेदारी की वजह से व्यस्तता से घिरा हुआ रहता है । ऐसे में परिवार एवं कार्यस्थल को समान तरीके से निभाना सबको बहुत ही कठिन लगता है। और ऐसे में लोग शिकायत करते है की मेरे पास अभी समय ही नहीं है । तो क्या सही में परिवार एवं कार्यस्थल को न्याय देना इतना कठिन है की लोग दूसरे के अतिमहत्वपूर्ण कार्यो को टाल डाल देते है? क्या हमारी खुद की प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) का कोई मोल नहीं है? क्या हम किसी कार्यके लिए प्रतिबद्ध हुए है, तो उसको जिम्मेदारी (रिस्पांसिबिलिटी) से पूरा करना हमारा कर्तव्य नहीं है? और अगर हम प्रतिबद्धता एवं जिम्मेदारी को सही मायनो में समझते है तो उसका सकारात्मक पालन जरुरी नहीं है ? यह सारे प्रश्नो का उत्तर "हाँ " है ।

प्रत्येक मनुष्य की अपनी कुछ सीमाएं होती है, जिसके रहते वह कुछ बातो में निपुण होता है तो कुछ सामान्य चीज़ो के लिए भी वह खुदको असमर्थ समझता है । इस असमर्थता को हम योग, ध्यान, साधना, प्रार्थना, आत्मविश्वास, सद्विचार एवं जीवन के नैतिक मूल्यों (ethics of life) का पालन करके दूर करनेका प्रयास कर सकते है । किन्तु आज मनुष्य यह सभी महत्पूर्ण आदर्शो को सिर्फ अपनी वाणी में प्रयोग करता है, जीवन में नहीं  । और अच्छे आदर्शो को अमल न करनेका यहीं आलस्य किसी भी मनुष्य के असफल एवं कठिन जीवन का कारण बन जाता है  । कुछ इंसान बड़े होदे के आने के बाद इस आलस्य के शिकार होते है तो कुछ लोग जीवन के नैतिक मूल्यों की अज्ञानता से जीवन को कठिन बनाते है ।

इंसान अगर खुद अपने आपको कार्यस्थल एवं परिवार की एकसाथ जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ समजे तो खुद की सीमाओं को समजके किसी भी हिन् भावना या ग्लानि का अनुभव किये बिना सहर्ष इस सीमा को समजकर; कार्य एवं परिवार में से किसको प्राधान्य देना है यह निश्चित कर लेना चाहिए । ऐसी असमर्थता को हम धीरे धीरे अच्छे आदर्शो को अपनाके, परिवार एवं शुभचिन्तको की सहायता से समर्थता में बदल सकते है । किन्तु वह इंसान, जो कुछ धन या पद-प्रतिष्ठा पाकर सिर्फ शब्दों में आदर्शो का ढिंढोरा पिटे किन्तु स्वयं के जीवन में उन आदर्शो का कोई मूल्य न हो एवं कार्य की ओर प्रतिबद्धता न हो एवं जिम्मेदारी से मुँह मोड़ ले तो ऐसे इंसान मानवसमुदाय के लिए बहोत बड़ा खतरा है ।

कुछ ऐसे इंसान होते है, जिन्होंने अपने जीवन में एक मुकाम हांसिल कर लिया होता है सिर्फ खुदके विकास एवं खुद की प्रगति के लिए ; ऐसे लोग अपने पद-प्रतिष्ठा के घमंड में दुसरो के मान-सम्मान, समय, पद किसी भी चीज़ की कोई क़द्र नहीं करता; जो मानवसमुदाय के लिए गंभीर विडम्बना है। अगर हम स्वयं अनुशाषित हो, खुद की सोच एवं कार्य के लिए प्रतिबद्ध होकर अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से सकारात्मक भाव रखकर निभाते है तो सामनेवाले इंसान एवं खुदकी गरिमा के लिए सराहनीय प्रयास होगा । किसी भी कार्य को सम्पूर्ण निष्ठां, प्रतिबद्धता, जिम्मेदारी और सकारात्मक भाव से किया जाए तो वह कार्य निश्चित ही समय पर सफल होगा । किन्तु लोग खुदका महत्व बढ़ाने के लिए दुसरो का कार्य करने में एवं उनको सहायता प्रदान करने में इतना आलस्य दिखाते है की खुद ही सब की उपेक्षा के पात्र बन जाते है । ऐसे लोग अपने आसपास के लोगो के बिच में भी उपेक्षा के पात्र बन जाते है, किन्तु कोई उस इंसान को यह बात प्रतीत नहीं करवाता ।

अगर इंसान जीवन के नैतिक मूल्यों का सम्मान करते हुए अपने कार्यो को ईमानदारीपूर्वक समय पे पूरा करे तो उस कार्य से जुड़े लोग, संस्था, देश एवं दुनिया को मददगार साबित हो सकता है । परिवार को समय देना या अपने निजी कार्य को सम्पन्न करना, यह इंसान की खुदकी समज और समय पे निर्भर करता है, किन्तु जब कार्यस्थल पे हो तो किसी को दिए गए समय पे उस कार्य को पूर्ण करना यह इंसान की नैतिक जिम्मेदारी है । अपने अहंकार, मद, पैसा, डिग्री, प्रतिष्ठा का घूँघट पहनके सिर्फ दिखावे की अच्छी बातो का कोई मूल्य नहीं। अगर ह्रदय में सच्चाई है, मन में पवित्रता है, सोच में समज है, दुसरो के लिए अच्छी भावना है, किसी की सहायता करने का उमंग है, इंसानियत की कदर है; तो हम सबको अच्छे कार्य के लिए  प्रतिबद्ध होकर, जिम्मेदारी से सही मायनो में मानवसमुदाय, समाज, देश एवं दुनिया के लिए कठिन कार्यो को सरल बनाना होगा ।

हम सबको जीवन के नैतिक मूल्यों को समझकर , कार्य के लिए प्रतिबद्धता दिखाकर, देश एवं दुनिया के लिए जिम्मेदारी लेकर और सभी लोगो के लिए वसुधैव कुटुंबकम की भावना जगाकर सबको मदद करके जीवन को सही रूप में सफल बनाना चाहिए। यदि “कार्य के लिए प्रतिबद्धता, जिम्मेदारी और उसका सकारात्मक पालन” की गुरूचाबी हर इंसान की समज में आ जाए एवं जूठे अहंकार  को त्यागकर सच्चाई और सहायता की भावना जाग्रत हो जाए तो प्रत्येक इंसान का जीवन सही मायनो में सफल बन सकता है; जो मानवसमुदाय के लिए कल्पवृक्ष समान महान उपलब्धि होगी। जिससे विश्व का प्रत्येक मनुष्य एकदूजे के शुभचिंतक एवं सहायक बनाकर आपसी भेद एवं द्वेष को दूर करके एक शांतिपूर्ण सुखी विश्व के निर्माण में सहायक बन सकता है ।

 

मिस दमयंती जी बड़घा (भिलाड़)

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 श्यामजी मिश्रा : 

“लाखों-करोड़ों भारतीय हार्ट-अटैक और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का शिकार बन सकते हैं, इसका कारण है मिलावट। दाल-चावल, फल-सब्ज़ियाँ, यहाँ तक कि दूध, जो हम बड़े चाव से अपने बच्चों को देते हैं, वो भी अब सुरक्षित नहीं,”

वर्तमान समय में धनार्जन की होड़ एवं नैतिकता का पतन इन दोनों कारणों से मिलावटी माल बनाने व बेचने का कारोबार असीमित रूप से बढ़ा है। खाद्य पदार्थो में मिलावट के नये नये तरीके अपनाए जा रहे है। और इससे जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। यधपि मिलावट करना और ऐसे माल की आपूर्ति विक्रय करना क़ानूनी द्रष्टि से अपराध है। समाज की नैतिकता एवं मूल्यों का पतन है, फिर भी चोरी छिपे यह दूषित धंधा खूब चल रहा है । यह एक ऐसी समस्या है जिससे शहर तो क्या गांव भी नहीं बचे हैं। जबकि इस समस्या पर पूरे देश को गंभीर होना चाहिए था, पर शायद ही कोई इस पर बात करता है। नेताओं को क्या दोष देना, आम नागरिक भी अपनी सेहत से जुड़े इतने गंभीर मुद्दे पर शायद ही चिंता जताते हैं। वैसे देखा जाए तो मुख्य रूप से गरीब देशों में खाद्य पदार्थो में मिलावट का गोरखधंधा बड़े स्तर पर चलता है। दूध में पानी, देशी घी में वनस्पति घी, सब्जी के मसालों में मिटटी तथा कूड़े करकट तथा लकड़ी के बुरादे के मिश्रण की मिलावट से उस वस्तु के गुणों के स्तर में कमी आती है। जबकि इसका सीधा असर उसका सेवन करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अधिक मुनाफा कमाने के लालच में सभी के भोजन को विषाक्त करने वालों के खिलाफ कठोर से कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। जबकि ऐसा करने वालों के खिलाफ प्रशासन कोई भी कार्रवाई नहीं कर पा रही है। सूत्रों की मानें तो इसी तरह वलसाड जिले में हाइवे के पास ऐसे कई ढाबा व होटल्स हैं जो मिलावटी पदार्थों के बने भोजन अपने ग्राहकों को परोस रहे हैं। बल्कि इतना ही नहीं इन होटलों में खाना बनाने वाले रसोईएं व होटल में काम करने वाले वेटर भी न ही सुरक्षित रूप से ग्राहकों को खाना परोसते हैं और ना ही बनाते हैं। यहां वलसाड जिले की ही बात नहीं है बल्कि पूरे देश में मिलावट का गोरखधंधा फल फूल रहा है। सब्जियों में कलर डालना, फलों में इंजेक्शन लगाकर उन्हें पकाना, खाने का तेल इत्यादि सब में मिलावट होती है। यहां तक कि दूूध जो अपने बच्चों को बड़ेे चाव से पिलाते हैं वो भी अब सुरक्षित नहीं है। 

 वर्तमान समय में वलसाड जिले के सरकारी अनाज के गोडाउनों की तो बात ही निराली है। इन सरकारी अनाज के गोडाउनों में भी मिलावटखोरी का गोरखधंधा खूब फल फूल रहा है, जो कॉन्ट्रैक्टरों व सरकारी बाबुओं की जुगलबंदी से निम्नस्तर का अनाज राशन की दुकानों पर पहुंच जाती है और ऊंचे स्तर का अनाज फ्लोर मीलों और अनाज व्यापारियों को बेच दी जाती है। एक तरह से देखा जाए तो गरीबों का निवाला छीनकर सरकारी बाबू, कंट्रैक्टर और बड़े व्यापारी मालामाल हो रहे हैं। आज जनसामान्य के बीच एक आम धारणा बनती जा रही है कि बाजार में मिलने वाली हर चीज में कुछ न कुछ मिलावट जरूर है । जनसामान्य की चिंता स्वाभाविक ही है । आज मिलावट का कहर सबसे ज्यादा हमारी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर ही पड़ रहा है । संपूर्ण देश में मिलावटी खाद्य-पदार्थों की भरमार हो गई है । आजकल नकली दूध, नकली घी, नकली तेल, नकली चायपत्ती आदि सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है । अगर कोई इन्हें खाकर बीमार पड़ जाता है तो हालत और भी खराब है, क्योंकि जीवनरक्षक दवाइयाँ भी नकली ही बिक रही हैं । एक अनुमान के अनुसार बाजार में उपलब्ध लगभग 30 से 40 प्रतिशत समान में मिलावट होती है । खाद्य पदार्थों में मिलावट की वस्तुओं पर निगाह डालने पर पता चलता है कि मिलावटी सामानों का निर्माण करने वाले लोग कितनी चालाकी से लोगों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं और इन मिलावटी वस्तुओं का प्रयोग करने से लोगों को कितनी कठिनाइयाँ उठानी पड़ रही हैं। आजकल दूध भी स्वास्थ्यवर्धक द्रव्य न होकर मात्र मिलावटी तत्वों का नमूना होकर रह गया है जिसके प्रयोग से लाभ कम हानि ज्यादा है । हालत यह है कि लोग दूध के नाम पर यूरिया, डिटर्जेंट, सोडा, पोस्टर कलर और रिफाइंड तेल पी रहे है । यही हाल उत्तर प्रदेश में भी है, जहां स्वास्थ्य विभाग की जांच से यह चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है कि राज्य के 25 प्रतिशत लोग घटिया, मिलावटी और हानिकारक दूध पी रहे हैं । देश के हर प्रदेशों में इतने बड़े पैमाने पर मिलावटी दूध की आपूर्ति से पता चलता है कि यह धंधा कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुका है । आपको बता दें कि हाल ही में जी न्यूज ने भी सिंथेटिक दूध के कारोबार का पर्दाफाश किया था और इसके खिलाफ लगातार छ: दिनों तक अभियान चलाया था कि किस तरह सुरक्षित समझे जाने वाले मदर डेयरी के दूध में भी सिंथेटिक दूध की मिलावट हो रही है । दूध के करीब एक हजार नमूनों की जांच की गई थी । इनमें से 211 में मिलावट पाई गई । आठ नमूनों में सोडा और शैंपू मिलाया गया था । दो नमूनों में पोस्टर कलर मिला था ।

 खैर महानगरों में भी दूध में मिलावट की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। बाजार में उपलब्ध खाद्य तेल और घी की भी हालत बेहद खराब है । सरसों के तेल में सत्यानाशी बीज यानी आर्जीमोन और सस्ता पॉम आयल मिलाया जा रहा है । देशी घी में वनस्पति घी की मिलावट मानों आम बात हो गई है । मिर्च पाउडर में ईंट का चूरा, सौंफ पर हरा रंग, हल्दी में लेड क्रोमेट व पीली मिट्‌टी, धनिया और मिर्च में गंधक, काली मिर्च में पपीते के बीज मिलाए जा रहे हैं । फल और सब्जी में चटक रंग के लिए रासायनिक इंजेक्शन, ताजा दिखने के लिए लेड और कॉपर सोल्युशन का छिड़काव, सफेदी के लिए फूलगोभी पर सिल्वर नाइट्रेट का प्रयोग किया जा रहा है । चना और अरहर की दाल में खेसारी दाल, बेसन में मक्का का आटा, दाल और चावल पर बनावटी रंगों से पालिश की जा रही है । मिठाइयों में ऐसे रंगों का प्रयोग हो रहा है, जिससे कैंसर का खतरा रहता है और डीएनए में विकृति आ सकती है । दवाओं में मिलावट तो मिलावट की सब सीमाओं को पार कर गई है । इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नकली दवाओं की समस्या और औषधि विनियमन पर गठित माशेलकर समिति ने नकली दवाओं का धंधा करने वालों को मृत्युदण्ड देने की सिफारिश की है । प्रश्न उठता है कि आखिर मिलावट के इस महारोग से निबटने के कानूनी रूप से क्या प्रावधान हैं ? सच्चाई तो यह है कि समस्या की जड़ में देश में जरूरी मानकों का अभाव है । सुरक्षित भोजन के संबंध में भारत में मुख्य कानून है- 1954 का खाद्य पदार्थ अपमिश्रण निषेध अधिनियम (पीएफए) । इसका नियम 65 खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों या मिलावट का नियमन करता है । लेकिन ये नियम सजा दिलाने में लगभग नाकाम ही साबित हो रहे हैं ।

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आप 3 बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं और अभी देश के प्रधानमंत्री हैं और ये एक संवैधानिक पद  है| आप ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनते समय शपथ ली थी कि आप इस देश के संविधान का पालन करेंगे लेकिन हमें आपको ये बताते हुए बहुत अफ़सोस हो रहा है कि आप अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां सही से नहीं निभा पाए व आप तो अंतर्राष्ट्रीय संधियों का भी अनादर करते हुए दिखाई दे रहें हैं|

गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए आपने नारा दिया सब का साथ और सबका विकास लेकिन आप अल्पसंख्यकों का विकास करना भूल गए इतना ही नहीं आपने अल्पसंख्यकों को और भी हाशिये में धकेल दिया|

महोदय आपने पूरी कोशिश की कि समाज संविधान की मूल भावना ‘राज्य का कोई धर्म नहीं होगा’ से हट कर हिन्दू बनाम मुस्लिम हो जाये लेकिन हम को आपको बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि भारत का नागरिक अब जाग चुका है और अपने संवैधानिक अधिकारों की आवाज उठाने लगा है|

दिनांक 17/ 01/19 को हम आपको ये बताना चाह रहे थे व याद दिलाना चाह रहे थे की आप जिस पद पर हैं उसकी गरिमा को आप निभाए व अंतर्राष्ट्रीय संधियों का पालन करें लेकिन आपने इसको अपना विरोध समझ लिया और एक बार फिर से नागरिकों का प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार को छीन लिया और हमको हमारे घर से ही उठा लिया व पूरा दिन थाने में बैठाया ये आप के पद की गरिमा को शोभा नहीं देता.

इस लिए आज हमको ये खुला पत्र लिखना पड़ रहा है कि आप अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकार जो की अनुच्छेद 14,15(2),15(4),16(1),16(2),16(4), 25(1),26,27, 28,29(1), 29(2),30(1,30(2),347, 350(A),350(B),37,38(2),46,51(A),51(C) में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि विधि के समक्ष समता, राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध के केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा,'नागरिकों के किसी भी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान करेगा, अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा, जिसका आप गुजरात में अमल नहीं कर रहे हैं|

10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणापत्र के अनुछेद 2,6,7,8,26 में अल्पसंख्यकों के विकास एवं रक्षण के लिए विशेष ध्यान देने की संधि पर भारत ने हस्ताक्षर कियें हैं, वहीँ 18 दिसम्बर 1992 को “राष्ट्रीय या जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों से संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों की घोषणा” पर भी भारत के हस्ताक्षर हें और सबसे नयी संधि जो की आपकी सरकार में आई हे 2015 में संयुक्तराष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals) जिसके लक्ष्य नंबर 10 व 16 में भी अल्पसंख्यकों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गयी है|

भारत इन सभी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को स्वीकार कर चुका है| लेकिन इनका अमल गुजरात में ही नहीं हो रहा है|

माइनॉरिटी को ओर्डिनेशन कमिटी (MCC) के आपसे कुछ सवाल हें हमें उम्मीद हे किसी न किसी पूर्व नियोजित प्रेस वार्ता में आप इन सवालो को भी शामिल करेंगे तो हमें ख़ुशी होगी|

जैसा कि आप जानते हैं कि किसी भी समाज के विकास की योजनाओं को चलाने के लिए एक विभाग की ज़रुरत होती है, 2006 में अल्पसंख्यक समाज पर विशेष ध्यान देने के लिए केंद्र में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय बना, देश के दूसरे राज्यों में भी है तो गुजरात में क्यों नहीं?

विकास की योजनाओं के लिए केंद्र के बजट में इस साल लगभग 4700 करोड़ है, देश के दूसरे राज्यों में अलग से बजट आवंटन है तो गुजरात में क्यों नहीं?

अल्पसंख्यक समुदाय की शिकायतों के निवारण के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग व देश के 18 राज्यों राज्य अल्पसंख्यक आयोग बने हैं तो अभी तक गुजरात में क्यों नहीं?

गुजरात में प्राथमिक शिक्षा में सामान्य लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 1.67% है वहीँ मुस्लिम लड़कियों की दर 10.58% है ऐसा गुजरात में क्यों?

गुजरात के अल्पसंख्यक बहुल विस्तारों में हायर सेकण्ड्री स्कूलों की भारी कमी है ऐसा क्यों?

देश के दूसरे राज्यों में अरबी, फारसी, उर्दू पढने वाले बच्चों को राज्य की भाषा के समकक्ष मान्यता दी गयी है, ये देश के दूसरे राज्यों में है तो गुजरात में क्यों नहीं?

सरकार के सभी कमेटी, कमीशन की रिपोर्ट बताती हैं कि अल्पसंख्यक समाज मुख्य धारा से पीछे है तो इनको बराबरी में लाने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज घोषित किया जाये, गुजरात में दूसरे समुदायों को पिछड़ेपन के आधार पर पैकेज दिया गया है तो अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं?

गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा से विस्थापित हुए हजारों परिवार हें इन लोगों के पुनर्स्थापन के लिए गुजरात सरकार ने अभी तक कोई पालिसी क्यों नहीं बनायी?

सच्चर कमेटी की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री का नया 15 सूत्रीय कार्यक्रम का दुसरे राज्यों में ठीकठाक अमल हो रहा हे लेकिन गुजरात में अमलीकरण लगभग न के बराबर है, ऐसा क्यों?

उम्मीद है कि आप हमारे इन सवालों का जवाब देंगे व् भारत के संविधान, अंतर्राष्ट्रीय संधियों को सही में लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाएंगे|

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 प्रफुल काका जब प्रशासक बनकर संघ प्रदेश आये तो बीजेपी वालों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। सोचा बीजेपी का पीएम,बीजेपी का एमपी अब तो एडमिनिस्ट्रेटर भी बीजेपी का ! खूब छनेगी। काका की खूब अगुवानी हुई,बुके दिये गये। काका की छाती गज भर की हो गयी। इतनी पूछ तो गुजरात में भी नहीं थी,जब वहाँ एचएम थे। क्या बात है। सही जगह पहुँचा हूँ। जब बीजेपी प्रमुखों ने हाजिरी लगाई तो ....ओहो हो...काका सोचे मैं ही यूटी बीजेपी का सुपर बॉस ! सोच बनी तो तेवर बदले। पीएम-सीएम को बुलाकर जता दिया हम भी कोई चीज हैं। भाषण ओहो..हो,हो....सुपर बॉस की तरह....ये कर देंगे,वो कर देंगे....। सोहबत का असर तो होता ही है। पीएम मोदी के साथ उठना-बैठना हो तो बोल-चाल से लेकर चेहरा-मोहरा भी बदल जाता है। सो बापू के भी बदल गये। साल भर तो खुब पुजवाया। फिर खबर लेना शुरू। भगत सिंह अरे अपने उमेश पटेल ! उन्हें बापू के लक्षण कुछ सही नहीं लगे। बंदे खाट खड़ी कर दी काकाश्री की। काका को गुजरात में अपने चार दिन की चौधराहट में ऐसे सिरफिरे से पाला नहीं पड़ा था। सोचे डराऊंगा तो डर जाएगा। बंदे ने उलटा काका की बैंड बजा दी। उधर नेशनल असेंबली के चुनाव सिर पर इधर बापू की सनक परवान पर। घर-वर सब तुड़वा दिया,खोदखाद ऐसी कि राह चलना दूभर। बीजेपी वालों की हालत खराब। काका तो मिट्टीपलीत करने पर तुला है। लोगों के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा। वोट मांगने किस मुँह से जाएंगे। बापू उधर डेलकर को घास डाल रहा था। इसे बीजेपीवाले हजम नहीं कर पा रहे थे। जिसे हराने के लिए हाथ-पैर तुड़वाये,दर-दर नहीं भटके उसे ही चारा डाल रहा है ! बहुत नाइंसाफी है। पेलो पण डाह्यो निकलो.पेलानी कॉलेज मांज मेडिकल कॉलेज शरू करवा राजी करी नाखी ! हवे तो भाजपीयो लालबूम ! उधर तीन राज्यों में बीजेपी हारी,इधर बड़े साहब की कुर्सी हिली। मोदी वंदना को लोग दौड़ा दिये दिल्ली। दौड़ाये क्या खुद लेकर गये। मोदी बापू तो बधी वात जाणे,पण करे काय ? पेलो तो चेलो। एटले वार्ता पती गई। इधर दोनों बीजेपी वालों को काका की वजह से दोनों ही सीट हाथ से जाती दिखी। पेलो एटलो गाबड़ा करेलो छे,जेने पूरता-पूरता पोते पुराइ जवाना एम छे...उधर पीएम मोदी के बाद बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे अमित शाह के कानों तक सारी बातें राजदारों के जरिये पहुँच रही थीं। उन्होंने भी खेल खेलना तय किया। एयरपोर्ट पर कानों में काका की बातें भी सुनीं और रास्ते में भक्तों की व्यथा भी। हवेली ग्राउंड वाले कार्यकर्ता सम्मेलन में बोल दिया दोनों पटेल सांसदों का विजय जुलूस निकालने तक दम नहीं लेना है। पीछे मंच पर बैठे लालूभाई,नटुभाई और नीचे आगे की पंक्ति में बैठी तरूणाबेन के चेहरे पर मुसकान खिल गई। हवे कोण काटे,टिकट तो पाकु थई गियु ! इधर अमित शाह ने तीनेक चेहरों को खिला दियो तो उधर नीचे सम्मेलन में बैठे टिकट के आकांक्षियों को अटैक का झटका महसूस हुआ। पर ऑल इज वैल बोलकर जिगरां को समझाया। उधर " छह वार जितेला अने सातवीं बार हारेला " को दिल की धड़कनें बढ़ती महसूस हुईं। ई कइसे संभव है ! हमें चारा खिलावत रहा कि लॉलीपॉप ? कि फिरकी लेत रहा ? काका भी ठगा-सा महसूस करे। ई का शाह जी खेलवा काहे बिगाड़ दिये। सौ में से साठ दिन तो चुप्पी साधे रहते कि टिकसवा किस को देंगे। तो चार महीना ज्यादा मौज से काटते ना ! उधर अमित शाह ने एक तीर से दो निशाने लगाये। एक टिकटार्थियों को ख्वाब देखना छोड़कर दोनों सिटिंग एमपी को जिताने का सबक दिया तो प्रफुल काका को आइना दिखा दिया कि सुपर-डुपर जो भी समझो बीजेपी का का बॉस हम हीं हैं। तब से दोनों बीजेपी वालों को थोड़ी राहत महसूस हुई कि ऊपर वाला भी है,जो सबकी खबर लेता है। अब ये बात जुदा है कि दोनों सीटों पर बिना खुर वाले घोड़े को लेकर कैसे रेस जीतें ?.......
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बेशक आज हमारा कैलेंडर  बदल गया 
लेकिन ऋतु नहीं बदली,
 न मौसम बदला,
ना  ही पृथ्वी का चक्र बदला,
ना पेड़ों ने पत्ते बदले ,
ना शाखों ने नए फूल ओढ़े,
ना हवाओं का रुख़ बदला ,
ना ही प्रकृति ने खुद को बदला,
फिर हम क्यों खुद को बदलते जा रहे हैं?
जो कहती है धरा,नही सुन पा रहे हैं?
या फिर सुनना ही नहीं चाह रहे हैं ?
तो सुनो प्रकृति यह कह रही है
जब पृथ्वी अपना वर्ष पूर्ण करेगी
प्रकृति इठला के कहेगी
धरती नई पत्तियों और फूलों की चुनर ओढेग़ी
चिड़ियाँ चेहचहाँएंगीं पक्षी गुनगुनाएंगे
सभी जीव नए उत्साह में झूमेंगे
जब पेड़ों में नई कोंपलों को देखकर,
सृष्टि में एक नई ऊर्जा का संचार होगा,
तब समझ जाना कि नव वर्ष है आया
और प्रकृति को शीष नावांनां
क्योंकि तब नई फसल कटेगी
जब बैसाखी और नवरात्र मनेगी
तभी नव वर्ष की सौगात मिलेगी।
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जीवननिर्वाह के लिए प्रत्येक मनुष्य को कार्य करके आजीविका से वेतन पाना अति आवश्यक है  । इंसान अपने शिक्षा, कौशल्य एवं इच्छा या मज़बूरी के तहत अपनी आजीविका तय करता है  । उसी कार्य से कमाए पैसो से वह खुदका  एवं अपने परिवार का गुजरान चलाता है  । एक दिन पुरे २४ घंटे का होता है जिसमे से हम कम से कम ६ से ८ घंटे अपने कार्यस्थल पर आजीविका हेतु व्यतीत करते है । कई लोग कार्य के प्रकार एवं नियम अनुसार ज्यादा समय भी कार्य करते है । यह पुरे दिन में कुछ चीज़े ऐसी होती है जो इंसान को भीतर ही बहोत शान्ति या बहोत चिंता देती है  । अब ये खुद पर निर्भर है की चीज़ो को कैसे आसान बनाये एवं किस प्रकार से कार्य करे की हमे कार्यस्थल और काम से लगाव हो जाए और घर पे लौटने के बाद परिवार को भी ख़ुशी का माहौल दे शके ।
 
आज के स्पर्धात्मक समय में कार्यस्थल पर हर इंसान अपने ऊपरी अधिकारी या बॉस को खुश करने के लिए अपनी क्षमता से ज्यादा काम करके सहकर्मचारियों से बेहतर साबित होने की कोशिश करता है । तो कुछ कर्मचारी खुदको स्मार्ट समझकर अपना कार्य प्रेमभरी बातें एवं कुछ निजी प्रलोभनों से दुसरो के पास करवाके तारीफें बंटोरता है । ऐसी स्थिति में जो खुद एकदम ईमानदारी से अपने कार्य से कार्य रखनेवाला इंसान ज्यादा मुसीबत का सामना जेलता है । क्योंकि हम सब लोग जानते है की आजकल दिखावे का जमाना है इसलिए ऐसे ईमानदारीपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्तियों को घमंडी या कामचोर की श्रेणी में धकेल दिया जाता है, जो बहोत ही शर्मसार एवं दुखपूर्ण घटना है।  चापलूसी करने वाले एवं अपने कार्य दूसरे पे थोपने वाले इंसान के पास पैसा कभी नहीं टिकता, वो किसी न किसी प्रकार की समस्याओ में घिरा रहता है । तो दूसरी ओर जिसके काम की कद्र नहीं होती वैसे कई ईमानदार कर्मचारी- व्यक्ति एक लघुताग्रंथि में बंध जाते है की हमारे काम की कभी कद्र ही नहीं होंगी; यह सोचकर उनकी कार्यक्षमता कम हो जाती है जो कंपनी या कार्यक्षेत्र के लिए आपत्तिजनक बात है । 
 
चाहे कार्यस्थल हो, कोई कोचिंग हो, पढ़ाई का स्थल हो या सरकारी दफ्तर हो की जहां से हम आजीविका या ज्ञान पाने हेतु समय व्यतीत करते है वहां काम का माहौल अच्छा होना अति आवश्यक है । अब ये माहौल खरीदकर तो लाना नहीं होता की हम लाकर रख दे और सब लोग शांति पूर्वक ख़ुशी से कार्य करे ! यह कार्य स्थल पर मौजूद हर इंसान की नैतिक जिम्मेदारी है की वह जीवन के सही आदर्शमूल्यो को समझकर दुसरो की भावना एवं प्रत्येक की खुदके कार्य अनुसार की मांग और पद को मान दे । चाहे कोई सहपाठी या सहकर्मचारी हमसे ज्यादा बुद्धिमत्त्ता का धनि हो या हम से कमजोर हो किन्तु उसके काम एवं उसके पद को मान देना चाहिए । जैसे सुई का कम तलवार नहीं कर सकती एवं तलवार की जगह सुई किसी काम की नहीं वैसे ही प्रत्येक मनुष्य का अपना एक महत्व है जिसको मान देना चाहिए । 
 
अगर कोई व्यक्ति अपने कार्यस्थल पर बहुत धनि या ऊँचे पद पर है तो उसको बहोत ज्यादा जिम्मेदारी या बहोत ज्यादा सोच-विचार कर कार्य करने होते है इसलिए वह अपने विचारो और काम  में ही व्यस्त रहता है;  तो ऐसे इंसान को घमंडी समझकर "हम उसके गुलाम नहीं या वो हमे भाव नहीं देते तो हम उसको क्यों बुलाये" ऐसी छोटो सोच नहीं रखनी चाहिए । साथ में ही उस व्यक्ति को भी चाहे  कितने भी बड़े पद पर हो या कितने भी कामो व्यस्त क्यों न हो, किन्तु अपने कार्यस्थल पर मौजूद लोगो के साथ कभी कभी मिलनसारता बढ़ानी चाहिए की जिससे लोगो के मन में उसके लिए गलत भाव पैदा ना हो  । वैसे ही कोई निम्नस्तर पर कार्य करते व्यक्ति के लिए उसके सहकर्मचारी को ऐसी भावना नहीं रखनी चाहिए की "मुझे उसकी जरूरत नहीं तो में क्यों उससे कोई व्यवहार या बात चित करू? उसको काम होंगे तो खुद मेरे पास आएंगे" । 
 
कुछ लोगो की कार्यस्थल पर बहोत ही स्वार्थपूर्ण हरकतें होती है, जैसे की खुद अपना काम दुसरो पर थोप देते है; और कभी तो "मुझे यह कार्य कैसे करना यह नहीं पता तो आप जिसे पता हो उसे दे दीजिये ऐसे करके जो व्यक्ति यह कार्य सालो से कर रहा है उसके ऊपर थोपकर खुद चाय की चुस्की लगाने भाग जाते है"  । ऐसी छोटी सोच रखनेवाले व्यक्ति अपनी चिकनी चुबडी बातो से लोगो को बेवक़ूफ़ बना देते है किन्तु खुद कभी ऊपर नहीं उठ पाते और फिर अपने सफल सहकर्मियों के लिए टिका टिपण्णी में समय व्यर्थ करते है  ।  साथ ही में ऐसे कामचोर व्यक्ति के पास किस तरह काम करवाना यह सुजबुझ उसके ऊपरी अधिकारी में होनी चाहिए, ताकि दूसरे कर्मचारी भी अपना समय सही काम में लगाके अपने कार्यस्थल को किसी न किसी प्रकार का  फायदा करवा शके । कार्यस्थल पर ऊपरी अधिकारी एवं जो सारे काम की निगरानी रखता हो उस व्यक्ति में समझदारी एवं सुजबुझ होना जरुरी है की वह सही, ईमानदार एवं कार्यसमर्पित लोगो की परख कर सके एवं समय आनेपर ऐसे व्यक्ति को कोई अच्छा फायदा हो या वह इंसान उस कार्यस्थल पर हमेशा के लिए स्थायी हो जाए ऐसा कुछ करे और उससे कंपनी/ संस्था को भी फायदा होता रहे  ।  किन्तु आजकल लोग इतने स्वार्थी हो गए है की उनको दुसरो की तरक्की हो या कोई फायदा मिले ये बिलकुल पसंद नहीं आता और वो खुद ही ऐसे अच्छे कर्मचारियों को परेशान करके उनको कार्य छोड़ने पर मजबूर कर देते है  । 
 
कार्यस्थल पर सबसे बड़ी विडम्बना यह है की कुछ लोग इतने कच्चे कान के होते है की दुसरो की सुनी सुनाई बातो पर यकीं करके अच्छे लोगो को जाने अनजाने बहोत कष्ट देते है एवं परेशान कर देते है। किन्तु दिमाग और बुद्धि सभी इंसान के पास होती है तो खुदको इंसान को देखना, समझना एवं परखना चाहिए फिर उसके लिए कोई राय बनानी चाहिए  ।  क्या पता जो इंसान आपको दुसरो के प्रति भड़का रहा हो या कोई अयोग्य बातें बताकर आपका उस अच्छे व्यक्ति से व्यवहार बंध  करवाना चाहता हो या आपसे उस व्यक्ति को होनेवाला फायदा बंध हो जाए इसी हेतु इधर-उधर की बातो से आपका मन भ्रमित कर रहा हो । इसलिए दुसरो की बातें सुनकर किसी भी इंसान के लिए गलत राय बनाकर कभी किसी से आपसी रिश्ते नहीं बिगाड़ने चाहिए  ।  जो इंसान दुसरो की राय पर किसी व्यक्ति से अपने अच्छे व्यवहार एवं सबंध को समेट लेता है वह मूर्खता के इतने करीब पहुंच जाता है की धीरे धीरे वह सारे अच्छे लोगो के संपर्क से बाहर निकलकर बुरी सोच वाले मनुष्य के संपर्क में रहकर अपनी बर्बादी को न्योता देता है  ।  एवं ऐसे इंसान के कार्य कभी सफल नहीं होते ।  किसीने सहायता की इसलिए उसकी बात मानकर अच्छे व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार करना यह एक गुलाम इंसान की निशानी है, क्योंकि जरुरत होने पर हमे किसीकी भी सहायता लेनी पड़ सकती है किन्तु इसका ये मतलब बिलकुल भी नहीं की जिसने सहायता की उसकी हर बातो पर यकीं करके उसके बताये रास्तो पर चलना चाहिए और किसी भी सच्चे और अच्छे मनुष्य को ठेंस पहुंचे ऐसा कार्य करना ! इसीलिए कार्यस्थल पर खुद का दिमाग, आंख और कान खुले  रहकर  अपनी बुद्धि का उपयग करके किसी भी इंसान से व्यवहार करना चाहिए  । 
 
कार्यस्थल पर छोटे, बड़े इंसान एवं होदे को सम्मान देना सीखना चाहिए  ।  कोई भी इंसान आपसे कितना भी छोटा क्यों न हो किन्तु उसकी बुद्धिमत्ता एवं कार्य की सराहना करनी चाहिए ; साथ में उसको मान भी देना चाहिए  ।  वैसे ही अगर किसी के पास ज्ञान थोड़ा कम है किन्तु वह उम्र में आपसे बड़े है तो उसको भी मान देना सही इंसान की पहचान है  ।  कुछ लोग अपने होदे, अनुभव एवं दुसरो के साथ अच्छी पहचान की वजह से इतने घमंड में घूमते है की दुसरो से प्रशंसा बटोरने में ही लगे रहते है, लेकिन किसी दूसरे की अच्छाई या सफलता पर प्रशंशा के दो बोल नहीं बोल सकते; ऐसे ईर्ष्यावले इंसान हिन् भावना से  इतने ज्यादा पीड़ित हो जाते है की वह दुसरो के कार्य को या सफलता को सराहने की क्षमता खो देते है और अपने आसपास के लोगो की टिका टिपण्णी के शिकार हो जाते है  । ऐसे लोगो के सामने कोई कुछ नहीं बोलता क्यूंकि वे घमंडी प्रकृति के कुंवे के मेंढक की तरह होते है, किन्तु उसकी इसी मुर्खपूर्ण एवं हास्यास्पद बर्ताव की खबर सब तक पहुँच ही जाती है  । 
 
कार्यस्थल पर कुछ लोग अपनी अच्छाई एवं परिवार से मिले अच्छे मूल्यों की वजह से दुसरो को महत्व देते है, दुसरो  के  अच्छे कार्य की प्रशंशा करते है एवं उनको याद भी कर लिया करते है; ऐसे लोगो की अच्छाई को कुछ लोग अपनी छोटी सोच की वजह से खुद बहोत महान व्यक्ति है ऐसे सोचकर उनको महत्व देने वाले लोगो को अच्छा प्रतिभाव् नहीं देते  और  खुदकी मूर्खता का सरेआम प्रदर्शन करते है  । कभी कोई सहकर्मचारी हमे कोई काम दे तो बहाने बनाकर या आलस्य की वजह से उसे ना  कहते पूर्व इतना याद रखना चाहिए की एसी स्थिति कभी हमारी भी आ सकती ही ।  सहपाठी-सहकर्मचारी बीमार हो या उसके परिवार  में समस्या हो तो उसको कामचोर या उसकी मजबूरी पे टिका टिपण्णी करने से पहले यह सोचना चाहिए के कभी एसी स्थिति में हम खुद आ जाए तो?  आपस में समझदारी से मिलजुल कर एकदूजे के मान   सम्मान देकर कार्य करने से कार्यस्थल का माहौल हमेशा खुशनुमा रहता है  ।  
 
कार्यस्थल पर टिका टिपण्णी, कामचोरी, आलस्य, अभिमान , जूठ, ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों को जीवन से बाहर फेंक के आपस  में समझदारी, साझेदारी, सहयोग, प्रेमभाव एवं इंसानियत की भावना को अपनाकर कार्यस्थल को मंदिर बनाना चाहिए  ।  अच्छी सोच एवं सच्चे भाव से मिलजुलकर ईमानदारी पूर्वक कार्य करने से कार्य से फायदा भी मिलता है एवं प्रत्येक इंसान की साथ में प्रगति होती है  ।  सारे लोग आपसी भेद एवं अहंकार को मिटाकर एकदूजे की खुशियों में शामिल हो सकते है और मुसीबत के वक़्त मदद करके दूसरे के दुःख को थोड़ा कम भी कर सकते है  । कार्यस्थल पर अगर अच्छा वातावरण मिले तो इंसान घर पर भी बिना किसी कार्यदबाव के तनावमुक्त अच्छा समय परिवार को दे सकता है  । अच्छे और खुशनुमा कार्यस्थल की वजह से इंसान का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और वह बिमारी की छुट्टियों के बजाय परिवार एवं सहकर्मचारियों के साथ अच्छे प्रसंगो को मनाने के लिए छुटियो का इस्तेमाल करता है  । अगर सभी लोग अपने जीवन में इंसानियत के गुण को सही मायनो में अपनाके कार्यस्थल पर एक सच्चे, अच्छे एवं ईमानदार कर्मचारी की तरह कार्य करे तो सभी क्षेत्र के सभी कर्मचारी एवं वह सारी कम्पनिया, संस्थाए  एवं सारे कार्यक्षेत्र अपने अपने क्षेत्र में अद्वित्य सफलता हांसिल करके देश को तरक्की की ऊंचाइयों तक पोहंचा सकता है  ।
 
दमयंती गोविंदभाई बडघा (भिलाड़) 
पि एच डी रिसर्च स्कॉलर 
अप्लाइड मेकेनिक्स डिपार्टमेंट
इस वि एन आई टी, सूरत
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लोकशाही के मुख्य चार आधारस्तंभ होते हे.संसद/धारासभा,कार्यपालिका,न्यायपालिका और चौथा स्तंभ हे मिडिया.यह चारों स्तंभ अगर मजबूत हे तभी लोकशाही टिकी रहती हे.यह चारों में से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्तंभ मिडिया हे.क्यूंकि मिडिया बाकि के तीनो स्तंभ पर नजर रखता हे.बाकि के तीनो स्तंभ को मिडिया सतर्क रखता हे और देशहित में कार्य करने का कर्तव्य याद दिलाता रहेता हे.अखबारों के साथ टीवी चेनल्स,वेबसाइट और मोबाईल एप भी मिडिया का ही हिस्सा हे.

 

हमारे देश का सौभाग्य रहा हे की अंग्रेजो के सामने आवाज उठानेमें उस समय का मिडिया अग्रेसर रहा था.चाहे वो अमृत बाज़ार पत्रिका हो या केसरी,ग़दर हो या पंजाबी या फिर गुजरात में सौराष्ट्र और जन्मभूमि-फुलछाब नामक अमृतलाल शेठ के समाचारपत्र.सभी ने बिना कोई डर अंग्रजों के सामने आवाज उठाई.किन्तुं जब आज़ादी के कुछ सालों बाद देश में जब आपातकाल लगाया गया तब समाचारपत्रों का गला घोंट दिया गया और जो सरकार कहे वहीँ खबर प्रसिध्ध करने का नियम लागु हुआ तब लालकृष्ण अडवाणीजी कहेते हे यूँ सरकारने सिर्फ जुकने को कहा था लेकिन कुछ माध्यमो ने तो साक्षात् दंडवत कर दिया.हालांकि उस समय कई ऐसे भी समाचारपत्र और सामायिक थे जिन्होंने देश के प्रति अपना फर्ज निभाया और आपातकाल के सामने हुई नागरिक स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना अमूल्य योगदान दिया.

 

जिस देशमें मिडिया का व्यवसायिकरण होने लगे और मिशन के बदले जब मिडिया सिर्फ प्रोफेशन बनकर रह जाये उस देश के भविष्य के सामने बहोत बड़ा प्रश्नार्थ खड़ा हो जाता हे.कोर्पोरेट कंपनियो को सीएसआर के तहत अपना सामाजिक दायित्व निभाने का दबाव डाला जाता हो तब राजकीयपक्षों के साथ साथ मिडिया भी अपनी सामाजिक जिम्मेवारी अच्छे से निभाए यह देश के उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हे.सही बात पे तंत्र की टिका अवश्य करें,राजकारणी भी जब अपनी जिम्मेवारी नैतिकता से न संभाले तब उसको निःसंकोच उजागर करें,भ्रष्टाचारीओं को भी समाज के सामने बेनकाब करके उसको त्वरित सजा मिले इसलिए तंत्र को टटोलते रहेना यह मिडिया का प्राथमिक फ़र्ज़ हे.किन्तुं सभी चीजों में सिर्फ और सिर्फ नेगेटिविटी ही फैलाना यह उदेश्य मिडिया का हरगिज़ नहीं हो शकता.भारत देश बहोत ख़राब ही हे,यहाँ कुछ अच्छा होनेवाला ही नहीं ऐसी छवि बने,हमारा बौध्धिक धन विदेश चला जाये और मिडिया के कारण विदेशों में भी देश की छवि ख़राब हो यह कितना उचित हे ?बलात्कार हो या कौभांड या फिर अन्य अपराध यह सब घटनाएँ विदेशों में भी होती रहती हे किन्तुं विदेशी मिडिया बिना अतिशियोक्ति विवेकपूर्ण तरीके से उसको दिखाती हे.११ सितंबर को अमरीका में हुए आतंकी हमले की एक भी नकारात्मक तस्वीर वहां के मिडिया ने नहीं दिखाई.

 

भारत के रूशीतुल्य पूर्व राष्ट्रपति स्व.ए.पी.जे.अब्दुल कलामने लिखा था की भारत का मिडिया इतना नेगेटिव कयूं हे ? भारत देश कई बातों में आगे हे फिर भी भारत का मिडिया ही हरबार भारत की नेगेटिव इमेज क्यूँ दिखाते रहता हे ? उन्होंने लिखा हे की एकबार में इजरायल के दौरे पर था.में तेल अविव पहोंचा उसके अगले ही दिन इजरायल में हमास द्वारा आतंकी हमला हुआ था.मैंने सुबह एक इजरायली अख़बार पढ़ा लेकिन उस अख़बार के प्रथम पन्ने पर एक यहूदी सद्गृहस्थ की तस्वीर के साथ समाचार थे जिसमे किस तरीके से उस सद्गृहस्थ ने वहां के रेगिस्तान को हरभरा कर दिया उसकी स्टोरी छपी हुई थी.ऐसे सकारात्मक उर्जा से भरपूर समाचार सुबह में पढने मिले.बौंम धमाके या हत्या इत्यादि के समाचार अन्दर के पेज पर बहुत छोटी सी जगह में छपा था.

 

समाज और खास करके युवाओं पर मिडिया का बहोत बड़ा प्रभाव होता हे.आज का युवान निराशावादी व अराजकतावादी न बने और युवाओं की शक्ति का दुरपयोग न हो इस प्रकार की समज विकसित करने में मिडिया की भूमिका अहम् हे.जीवन जीने की सही दिशा मिले उस प्रकार के बहुत सारे पोजिटिव न्यूज़ देश और दुनिया में बनते ही रहेते हे.ऐसे प्रेरणादायी समाचार ज्यादा से ज्यादा प्रसारित हो यह जरुरी हे.

 

सरकार के साथ साथ देश के नागरिकों को भी अपनी जिम्मेवारी के प्रति जागृत करना अत्यंत आवश्यक हे.हमारे यहाँ किसी भी चीज के लिए सरकार को ही दोषित ठहराने एक फेशन सी हो गई हे.पहेले राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के निवेदन व कार्यक्रमों की जानकारी अख़बारों में प्रथम पेज पर हेडलाइन बनते थे.किन्तुं धीरे धीरे यह जगा नेगेटिव न्यूज़ ने ले ली.इस नेगेटिविटी के कारण नागरिकों में भी उदासीनता व निराशा फैलाव बढ़ जाता हे. हद तो तब हो गई की कई अख़बारों ने १९९३ के मुंबई बौम्ब धमाके में दोषित त्रासवादी याकूब मेमन को फांसी हुई तब उसके प्रति लोगों को सहानुभूति हो ऐसा हेडिंग बनाया था.कमनसीब से अभी भी मिडिया का एक वर्ग हिजबुल मुजाहिद्दीन के त्रासवादीओं के लिए ‘वर्कर’ शब्द का प्रयोजन करते हे.

 

सामाजिक सोहार्द बनाये रखने में मदद करने की अपनी जिम्मेवारी से भी मिडिया मुं कर दे और सामाजिक एवंम सांप्रदायिक वैमनस्य बढे ऐसे समाचार मसाला डालकर प्रसारित करे तब एक सच्चे देशप्रेमी को पीड़ा होना स्वाभाविक हे.इसी तरह भारतीय संस्कृति की सही बात लोगों तक पहुंचे,युवाओं में राष्ट्रगौरव जागृत हो,उतम चारित्र्य का निर्माण हो,प्रमाणिकता,वफ़ादारी,सत्य,अहिंसा,परिवार प्रेम,भाईचारा इत्यादि जैसे मूल्यों का सिंचन हो उस प्रकार के लेख व समाचार ज्यादा से ज्यादा प्रसिध्ध करने के बजाय जब कोई मिडिया विकृति से भरे समाचारों को ज्यादा महत्व देता हे तब बहोत दर्द होता हे.देश का मिडिया अगर देशहित और समाजहित को ज्यादा से ज्यादा प्राथमिकता देगा तभी हम मूल्यनिष्ठ समाजव्यवस्था के साथ समृध्ध व सुसंस्कृत देश होने का गौरव सुरक्षित रख पाएंगे.

 

किसीभी हालात में देश के युवाओं में अपने देश के प्रति कभी भी नफरत पैदा न हो,सभी देशवासी देशहित को अग्रता दे,ज्ञाति-जाती व धर्म की सीमाओं से लोग बहार निकलके राष्ट्रप्रथम की भावना के साथ देश की उन्नति के लिए सोचे ऐसे वातावरण का निर्माण करने में मिडिया ज्यादा से ज्यादा सहयोग दे और सभी मीडियाकर्मी संपूर्ण सकारात्मकता के साथ राष्ट्र के पुनरुत्थान कार्य में सहयोग देकर अपना देशप्रेम लोगों के सामने व्यक्त करते रहे इसी प्रार्थना के साथ भारत माता की जय – वंदेमातरम्.

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श्यामजी मिश्रा 
 
अपने देश की राजनीति में सब कुछ संभव है, राजनीति में ना तो कोई दोस्त होता है और ना ही दुश्मन, सभी मौका परस्त होते है। यह उदाहरण गुजरात के सूरत, वलसाड, वापी, मुंबई व ठाणे जिले में उत्तरभारतीयों के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं से मिल सकती है। कई दशकों से उत्तरभारतीय समाज के ठेकेदार बने लोगों ने सिर्फ संगठन बनाकर उत्तरभारतीयों के नाम पर अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकी, परन्तु आज तक उत्तरभारतीय समाज का कोई भी भला नहीं हुआ। उत्तरभारतीय संगठन के नाम पर ये स्वघोषित उत्तरभारतीय नेताओं ने चल-अचल संपत्ति के साथ साथ खूब धन अर्जित किए और अलग अलग पार्टियों से कोई सांसद, विधायक बने तो कोई मंत्री तक का सफर तय कर आज ऐसोआराम की जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं, परंतु उत्तरभारतीय समाज का वही हाल है जो पहले था, आज भी उत्तरभारतीय समाज अपने आपको ठगा हुआ मेहसूस कर रहा है। चुनाव जब नजदीक आता है तो हर पार्टी के कथित उत्तरभारतीय नेता सक्रिय हो जाते हैं और शाम-दाम - दंड-भेद हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं, ऐसे-ऐसे भड़काऊ भाषण देते हैं कि मनसे जैसी पार्टियां बेकसूर उत्तरभारतीयों को टार्गेट कर अपना भड़ास निकालती है। जब बेकसूर उत्तरभारतीयों को मारा-पीटा जाता है तब ये कथित उत्तरभारतीय नेता अपने अपने घरों में दुबक कर और मीडिया को मैनेज कर इस तरह की अनर्गल बयानबाजी शुरू कर देते हैं कि जिससे माहौल और खराब हो। ये कथित उत्तरभारतीय नेता घर में दुबक कर ऐसे ऐसे बयानबाजी करते हैं कि जैसे इनसे बड़ा उत्तरभाारतीयों का हिमायती कोई नहीं है। अब वर्तमान समय में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बयानों पर भाजपा के उत्तरभारतीय नेताओं ने धरना प्रदर्शन से लेकर बयानबाजी शुरू कर दी है। अब एकाएक उत्तरभारतीयों के मसीहा पैदा हो गए हैं, अब ये तथाकथित उत्तरभारतीय नेता इस मौके को गवाना नहीं चाहते हैं, इसलिए अब ये भाजपा के उत्तरभारतीय नेता कांग्रेस के उत्तरभारतीय नेताओं पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। चाहे भाजपा से जुड़े उत्तरभारतीय नेता हों या कांग्रेस से जुड़े उत्तरभारतीय नेता या अन्य पार्टियों से, लेकिन ये सभी उत्तरभारतीय नेता एक भी मौका अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते, क्योंकि इनके राजनीतिक कैरियर का सवाल है। 
  अभी कुछ महीनों पहले कांदीवली में मनसे के कार्यकर्ताओं ने उत्तरभारतीयों के साथ मारपीट की और यह खबर कथित उत्तरभारतीय नेताओं को मिली। इसमें से एक अपनेे आपको उत्तरभारतीय नेता कहलाने वाले मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम घटना स्थल पहुंच गए और राजनीति शुरू कर दी , परंतु जब मनसे कार्यकर्ताओं को इसकी भनक लगी तब संजय निरूपम वहां से दुम दबाकर भाग निकले। इसी तरह एक घटना मालाड में हुई थी, तब यही नेता अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर आराम फरमाते रहे। जबकि भाजपा से जुड़े उत्तरभारतीय नेता नदारद रहे। जबकि देखा जाए तो यही संजय निरूपम जब उत्तरभारतीयों के सहयोग से उत्तर मुंबई जिला में सांसद बने थे, तब पांच साल तक किसी भी उत्तरभारतीय को अपने नजदीक में नहीं रखा, जो उनके लिए दिन रात मेहनत करके चुनाव जितवाये थे। परंतु इन्हीं लोगों की वजह से पिछला लोकसभा चुनाव हार गए थे, जो वर्तमान समय में संजय निरूपम के सिपहसालार बने हुए हैं। खैर अब इन सिपहसालारों की पांचों ऊंगुलियां घी में है जो समयानुसार चाटन पद्धति चालू है। 
  यही हाल गुजरात में भी है जहां कुछ महीनों पहले उत्तरभारतीयों को पीट पीटकर निकाला गया और उस समय में भी यही उत्तरभारतीयों के मसीहा बने कांग्रेस व भाजपा से जुड़े उत्तरभारतीय नेता सिर्फ बयानबाजी करते नजर आए, लेकिन खुलेतौर पर कोई भी अपनी पार्टी के विरोध में बयानबाजी नहीं की सिर्फ एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते रहे। अब सवाल यह है कि उत्तरभारतीय समाज कौन सी पार्टी के उत्तरभारतीय नेताओं पर विश्वास करे। क्योंकि उत्तरभारतीय संघ से लेकर उत्तरभारतीय एकता मंच, उत्तरभारतीय सभा, उत्तरभारतीय महासंघ इस तरह की तमाम उत्तरभारतीय संगठन महाराष्ट्र व गुजरात में ज्यादातर सक्रिय हैं। ये सभी उत्तरभारतीय संगठन के नेता किसी न किसी पार्टी में उत्तरभारतीयों के नाम पर प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। एक तरह से देखा जाए तो उत्तरभारतीयों के नाम पर अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लगे हुए हैं। इन नेताओं को न किसी उत्तरभारतीय से कोई लेना देना है न उनकी समस्याओं से, इन्हें तो बस पार्टी के आला कमान की तलुआ चाटन वाली पद्धति अपनाकर अपना उल्लू सीधा करना है बस। ऐसे कई उत्तरभारतीय संगठन गुुजरात के सूरत, वलसाड, वापी, मुंबई व ठाणे में मौजूद हैं, परंतु इन सभी संगठनों के सर्वेसर्वा सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के कठपुतली बनकर रह गए हैं। यही कारण है कि इन्हीं तथाकथित उत्तरभारतीय नेताओं की वजह से गुजरात और महाराष्ट्र के उपनगरों में रह रहे उत्तरभारतीयों में एकता का अभाव है, जिससे आये दिन कोई न कोई उत्तरभारतीय हमेशा अपमानित होता रहता है। अभी हाल ही में मुंबई के कांदीवली में युवा व छात्र महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरूण मिश्रा ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें उत्तरभारतीयों के धुरविरोधी रहे मनसे प्रमुख राज ठाकरे को बुलाकर उत्तरभारतीयों और मराठियों के बीच नफरत करने वाली राजनीति को पूर्णविराम लगाने की कोशिश की गई है, परंतु अब देखना यह है कि अरूण मिश्रा का यह प्रयास सफल होता है, या उनका यह प्रयास भी राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। 
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दमयंती गोविंदभाई बड़घा (भिलाड़)
पि एच डी रिसर्च स्कॉलर 
ऐस वि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी,  सूरत-
 
मानव जीवन अमूल्य है जिसे ऐसे ही स्वार्थ हेतु व्यर्थ करना इस कुदरती भेंट का अपमान है । यह सर्वसत्य हकीकत को कई लोग मानते भी है और जानते भी है । मानव जीवन को सार्थक बनाने हेतु जीवन के अति मूल्य मानवीय गुण जैसी की एकता, भाईचारा, सहिष्णुता, अहिंसा, कर्मयोगिता, दया, परोपकार, सही समझदारी, सहायता की भावना, परस्पर प्रेम और ऐसे कई अच्छे गुण होना अति आवश्यक है । ऐसी ही कुछ अच्छी भावना के साथ संयुक्त राष्ट्र ने विविधता में एकता के महत्व को समझाने के लिए यह विश्व मानव एकता दिवस २० दिसंबर को मनाने की घोषणा की थी जो अति सराहनीय कार्य था । अब इस दिवस को सही मायनो में सार्थक करने क लिए विश्व के प्रत्येक मनुष्य को अपना योगदान देना होगा ।
हम सबको जाती, धर्म, पद, प्रतिष्ठा, पैसा; किसी के साथ भी तुलना किये बिना इंसानियत के नाते सच्चे नागरिक एवं सच्चे और अच्छे मनुष्य की तरह सारे भेद मिटा कर एक स्तर पर आकर विश्व में एकता किस तरह बनाई जाए इस दिशा की ओर अपने प्रयास बढ़ाने होंगे  । चाहे कोई कितना भी अमीर या विद्वान इंसान क्यों न हो किन्तु अगर वो किसी के काम नहीं आ सकता, किसी की मदद नहीं कर सकता, किसी की अच्छाई पे सराहनीय दो शब्द नहीं बोल सकता, दुसरो की अच्छाइया देखकर उसको आगे बढ़ने के बजाये बस कमिया देखकर खुद की श्रेष्ठता दिखाना चाहता है तो उस मनुष्य का जीवन मानव समुदाय के लिए एक श्राप है । क्योंकि ऐसे इंसान बस अपना महत्त्व  बढ़ाने हेतु एवं खुद सर्वश्रेष्ठ है यह सोचकर अपने अहंकार और मद में चलता है एवं ऐसी ही सोच चारो ओर फैलाकर एकता ओर भाईचारा की भावना को नष्ट करता है ।
 
यह मानवजीवन एक दूसरे को नीचा दिखने के लिए  या अपनी पद प्रतिष्ठा का गलत फायदा लेने के लिए नहीं दिया गया। मानवीय मूल्यों को साथ रहकर प्रत्येक व्यक्ति को हो सके उतना समझकर जो उलझने एवं भेद है उनको मिटाना है  । किन्तु आज इंसान प्रगति, विकास, मान, सम्मान ,पैसा एवं महत्व पाने के लिए एक दूजे से अंतर बढ़ा रहा है । किसी की प्रगति को देखकर ईर्ष्या लाने के बजाये उसकी अच्छाई को किस तरह मानवोपयोगी कार्यो में लगाया जाए ये सोचना चाहिए  । ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा एवं पैसो का घमंड करके किसी भी मनुष्य या जिव मात्र को ठेंस पोहचाने वाला व्यक्ति मानवमूल्यों की गरिमा का अपमान करके स्वयं दोषी सिद्ध होता है और ऐसे दोषी व्यक्ति कितने भी आगे हो किन्तु किसीके लिए भी अच्छा कार्य नहीं कर सकते जो विश्व एकता के लिए बड़ी समस्या है । कोई इंसान सर्वगुण संपन्न नहीं है किन्तु सब में कुछ अच्छाई एवं बुराइया भी होती है, तो उस अच्छाईसे कैसे मानवकल्याण हेतु उपयोग किया जाए यह सोचकर सबको साथ मिलकर एकता को सही अर्थ में स्थापित करना है  ।क्या पता इसी रास्ते पर चलते खुद की कमिया खुद समझकर उसको कैसे अच्छाई में बदले ये  भावना भी अपने आप में विकसित हो जाए?
कोई भी अच्छा कार्य करने के लिए अच्छी सोच एवं सच्चे प्रयास बहोत जरुरी है। अगर सर्व मानव समुदाय कुदरत के दिए अच्छे मानवमूल्यों के सहारे एक दूजे का साथ देकर आगे बढ़ेंगे एवं सारे भेद मिटाकर परस्पर भाईचारा की भावना से विश्व में जो दूषण प्रवर्तित है उसको साथ मिलकर कम करने की कोशिश करेंगे तो यह विश्व सही मायनो में विश्व एकता की भावना को कायम करते हुए विश्वशांति की और अपना पहला कदम बढ़ायेंगा  ।
 
 
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एडिटर ओपेनियन

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